मैं भी सोचूं तू भी सोच
बिन तूफां क्यूँ डूबी कश्ती, मैं भी सोचूं तू भी सोच
अपनों ने क्यूँ लूटी बस्ती, मैं भी सोचूं तू भी सोच
दहेज़ भी लाये, नजर झुकाए, ये कैसा दस्तूर है..
बावजूद वो ही क्यों जलती, मैं भी सोचूं तू भी सोच
बार बार जिसने है लूटा, जिसका हर वादा है झूठा
फिर क्यों उसको सौंपी कश्ती, मैं भी सोचूं तू भी सोच
बढती चांदी, बढ़ता सोना, महंगा हो गया कोना कोना
फिर क्यूँ है जिंदगानी सस्ती, मैं भी सोचूं तू भी सोच
बाजारों में साधन सारे, मिल जाते है हाथ पसारे
कहाँ गई मन की वो मस्ती, मैं भी सोचूं तू भी सोच
kya baat hai dinesh ji ye aapki kavita man ko chhoo gayi dhanyawaad ji
जवाब देंहटाएंthnx a lot
जवाब देंहटाएंvaise aapse milne ki badi tamanna hai kabh ijaisalmer padharo tab mere se mile bina jaane ka koi plan mat rakhna waiting for your jaisalmer tour
हटाएंकमाल का लिखते हैं आप ............
जवाब देंहटाएंकमाल लिखने से ज्यादा आप जैसे कद्रदानों के समझने में है सीमाजी....धन्यवाद
जवाब देंहटाएंBhai sab sach me aapki kavita sab se best h..bas samjhne wala chahiye
जवाब देंहटाएंBadhiya....
जवाब देंहटाएंA nice one... sochne par majbur kar hi diya...!!!!
जवाब देंहटाएंक्या बात है सर जी ......!!!!!!
जवाब देंहटाएंwah bhai shab
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