गुरुवार, 26 नवंबर 2015

नौकरी सरकारी !!!
एक आदमी
मरकर पहुंचा
इन्द्र के दरबार,
जीवन के उसके
थे कुछ पुण्य
पाप भी किये थे
उसने कई बार!
पुण्यों का देने फल
यमराज ने उसे
पहले पांच साल हेतु स्वर्ग भिजवाया
लेकिन पांच दिन बाद ही
उसका सन्देश आया-
‘हे! यमराज,
नहीं चाहिए मुझे स्वर्ग की सुविधाए
मुझे तो आप कहीं और ही भिजवायें.’
सोचा यमराज ने
‘बड़ा विचित्र मनुष्य है
स्वर्ग ठुकरा रहा है
यह तो धर्मराज युधिष्ठिर से भी
दो कदम आगे जा रहा है!’
खुश हुए यमराज
दे दिया वरदान
कुछ भी मांग लो तुम
हे मनुष्य महान.’
बोला मनुष्य रूककर
थोडा सा झुककर
‘स्वर्ग में तो है पाबन्दी
काम ही काम
बिना ‘कुछ’ लिए ही
लेना पड़ता है प्रभु का नाम
दिया है आपने वरदान
मांगने की मेरी बारी
भिजवायें मुझे पृथ्वी पर
और दिलवाएं ‘नौकरी सरकारी’.”

मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

अप्रैल फूल 


एक दिन नेताजी से 
पूछा हमने-
"आज कौनसी तारीख?"
नेताजी बोले-
"एक अप्रैल"
तीन दिन बाद वो फिर मिले 
हमने फिर से पूछा -
"आज कौनसी तारीख?"
वो बोले-"एक अप्रैल।"
कुछ दिन बाद वो फिर मिले 
फिर से हमने पूछा-
"आज कौनसी तारीख?"
मुस्कराते हुए बोले-
"एक अप्रैल।"
जब भी हमने ये सवाल दोहराया 
हमेशा एक अप्रैल उत्तर ही पाया 
हम चकरा गए 
थोडा घबरा गए 
"ये क्या है माजरा 
हमें भी बताओ जरा?"
मुस्कराते हुए बोले नेताजी -
"एक अप्रैल को लोग 
'मूर्ख दिवस' मनाते हैं 
एक दूसरे को 
मूर्ख बनाते हैं 
हम तो रोज ही 
इस देश की जनता को 
मूर्ख बनाते हैं और 
रोज 'अप्रैल फूल' मनाते हैं.
अपना तो यही है खेल 
हर दिन है हमारा एक अप्रैल!!"

रविवार, 16 मार्च 2014

मास्टर मुखौटा 

एक दिन टहलते टहलते 
निकल गए थे हम बाज़ार 
थी खूब चहल पहल 
बज रहे थे चार 
अचानक नजर आयी हमें 
एक ऐसी दुकान 
बाजार में थी भीड़ बहुत 
लेकिन वो थी बिलकुल सुनसान 
पूछा दूकानदार से हमने-
'' क्या है यह माजरा 
क्यों नहीं ग्राहक एक 
हमें बताओ ज़रा ''
दुकानदार बोला ऐसे 
दस बेटियों का हो बाप-
''मेरा हाल जानकार बाबू 
क्या कर लेंगे आप?
पहले मेरी दूकान भी 
खूब थी चलती 
सारे बाज़ार की भीड़ 
यहीं थी मचलती 
बेचता हूँ मैं मुखौटे 
खरे और खोटे 
चमचे के, नेता के 
डाकू के, अभिनेता के,
झूठे दुःख  प्रदर्शन के 
सच्चे सुख के दर्शन के 
दिल में हो 'कुछ' और 
चेहरे पर 'कुछ और'
कोई कैसे ला पाता 
इसलिए हर कोई था 
मेरे मुखौटे ले जाता 
पर अब तो आदमी के चेहरा ही 
'मास्टर मुखौटा' हो गया है 
बदलते बदलते चेहरे का रंग 
असली चेहरा पता नहीं 
कहाँ खो गया है !!!

बुधवार, 4 सितंबर 2013


मैं भी सोचूं तू भी सोच

बिन तूफां क्यूँ डूबी कश्ती, मैं भी सोचूं तू भी सोच

अपनों ने क्यूँ लूटी बस्ती, मैं भी सोचूं तू भी सोच

दहेज़ भी लाये, नजर झुकाए, ये कैसा दस्तूर है..

बावजूद वो ही क्यों जलती, मैं भी सोचूं तू भी सोच

बार बार जिसने है लूटा, जिसका हर वादा है झूठा

फिर क्यों उसको सौंपी कश्ती, मैं भी सोचूं तू भी सोच

बढती चांदी, बढ़ता सोना, महंगा हो गया कोना कोना

फिर क्यूँ है जिंदगानी सस्ती, मैं भी सोचूं तू भी सोच

बाजारों में साधन सारे, मिल जाते है हाथ पसारे

कहाँ गई मन की वो मस्ती, मैं भी सोचूं तू भी सोच



गुरुवार, 22 अगस्त 2013

                तेरा क्या होगा रे !!!

आलू महंगा, प्याज भी महंगा, महंगा सब कुछ होगा रे,
अब  केवल  तू  हवा खायेगा,   तेरा  क्या  होगा  रे!!!

टाटा मोटा,  बिरला मोटा,  मोटा होता अम्बानी,
तुमको ही है छोटा होना,  तेरा  क्या  होगा  रे!!!

मोदी बोले, अन्ना बोले, दिग्गी राजा बोल रहे
इन सबकी बोला बोली में, तेरा क्या होगा रे!!!

पांच साल का मेहमाँ  देखो, एक बार फिर से आया
होगा अतिथि अब भी देव तो,  तेरा क्या होगा रे!!!

देखी लड़की, आँख भी फड़की, जोर की यारी चल निकली
जब  होगा  ये  बटुआ  खाली,  तेरा  क्या  होगा  रे!!!


शुक्रवार, 17 मई 2013




क्या करेगी मेनका!!!

इंद्र के दरबार से एक दिन
मेनका आई
देखकर मुझे
वो मुस्कराई
मैंने पूछा -
सुन ओ मेनका रानी!
किसकी शामत है आई
जो पड़ी है इस धरती पर
तेरी परछाई
करते हुए ठिठोली
मेनका बोली
इस बार तेरा ही नंबर आया है
इंद्र देव ने मुझे
तेरे लिए ही भिजवाया है
पर तुझे देखकर तो लगता है ऐसा
कि यह मेरे हुश्न का अपमान है,
मैं हूँ राज भोज तो तू
गंगू तेली समान है.
फिर तरह तरह से मेनका
केबरे करने लगी
देखकर उसको दिशाएँ
आहे भरने लगी
पर मैं नही रीझा
ना ही मेरा दिल पसीजा
आखिर मेनका हार गई
पुनः स्वर्ग सिधार गई
पर जाते जाते बोली
हे मानव!
तपस्या कैसी है यह तेरी
जो मेहनत व्यर्थ हो गई
सारी की सारी  मेरी
हमने कहा-
सुन ओ मेनका रानी
वो विश्वामित्र तो करता था तपस्या
इन्द्रासन के लिए
इसलिए बेचारा फंस गया
और तेरा जादू  गया
पर यहाँ तो हम करते है तप  कठोर
ताकी दिन भर के मेहनत के बाद
मुंह में चले जाए रोटी के कुछ कौर
इसलिए तू तो क्या
तेरे जैसी कई मेनकाएँ आएगी और जाएगी
पर हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पायेगी।
  



मंगलवार, 23 अप्रैल 2013


उसे उधार दो....
एक मित्र ने हमसे कहा-
‘अम्मा यार,
एक सज्जन
रोज मेरे घर आते हैं,
चाय नाश्ते के साथ
दिमाग भी खाते हैं.
कोई उपाय बतलाओ
हमें उनसे छुटकारा दिलवाओ.’
हमने कहा-
‘ऐसा करो मेरे यार
उसे दे दो तुम
कुछ रूपये उधार
फिर देखना
ऐसी राहत मिल जाएगी.
वह तो क्या
उसकी परछाई भी
तुमारे पास नहीं आएगी.!!!