रविवार, 16 मार्च 2014

मास्टर मुखौटा 

एक दिन टहलते टहलते 
निकल गए थे हम बाज़ार 
थी खूब चहल पहल 
बज रहे थे चार 
अचानक नजर आयी हमें 
एक ऐसी दुकान 
बाजार में थी भीड़ बहुत 
लेकिन वो थी बिलकुल सुनसान 
पूछा दूकानदार से हमने-
'' क्या है यह माजरा 
क्यों नहीं ग्राहक एक 
हमें बताओ ज़रा ''
दुकानदार बोला ऐसे 
दस बेटियों का हो बाप-
''मेरा हाल जानकार बाबू 
क्या कर लेंगे आप?
पहले मेरी दूकान भी 
खूब थी चलती 
सारे बाज़ार की भीड़ 
यहीं थी मचलती 
बेचता हूँ मैं मुखौटे 
खरे और खोटे 
चमचे के, नेता के 
डाकू के, अभिनेता के,
झूठे दुःख  प्रदर्शन के 
सच्चे सुख के दर्शन के 
दिल में हो 'कुछ' और 
चेहरे पर 'कुछ और'
कोई कैसे ला पाता 
इसलिए हर कोई था 
मेरे मुखौटे ले जाता 
पर अब तो आदमी के चेहरा ही 
'मास्टर मुखौटा' हो गया है 
बदलते बदलते चेहरे का रंग 
असली चेहरा पता नहीं 
कहाँ खो गया है !!!