मास्टर मुखौटा
एक दिन टहलते टहलते
निकल गए थे हम बाज़ार
थी खूब चहल पहल
अचानक नजर आयी हमें
एक ऐसी दुकान
बाजार में थी भीड़ बहुत
लेकिन वो थी बिलकुल सुनसान
पूछा दूकानदार से हमने-
'' क्या है यह माजरा
क्यों नहीं ग्राहक एक
हमें बताओ ज़रा ''
दुकानदार बोला ऐसे
दस बेटियों का हो बाप-
''मेरा हाल जानकार बाबू
क्या कर लेंगे आप?
पहले मेरी दूकान भी
खूब थी चलती
सारे बाज़ार की भीड़
यहीं थी मचलती
बेचता हूँ मैं मुखौटे
खरे और खोटे
चमचे के, नेता के
डाकू के, अभिनेता के,
झूठे दुःख प्रदर्शन के
सच्चे सुख के दर्शन के
दिल में हो 'कुछ' और
चेहरे पर 'कुछ और'
कोई कैसे ला पाता
इसलिए हर कोई था
मेरे मुखौटे ले जाता
पर अब तो आदमी के चेहरा ही
'मास्टर मुखौटा' हो गया है
बदलते बदलते चेहरे का रंग
असली चेहरा पता नहीं
कहाँ खो गया है !!!
