मैं भी सोचूं तू भी सोच
बिन तूफां क्यूँ डूबी कश्ती, मैं भी सोचूं तू भी सोच
अपनों ने क्यूँ लूटी बस्ती, मैं भी सोचूं तू भी सोच
दहेज़ भी लाये, नजर झुकाए, ये कैसा दस्तूर है..
बावजूद वो ही क्यों जलती, मैं भी सोचूं तू भी सोच
बार बार जिसने है लूटा, जिसका हर वादा है झूठा
फिर क्यों उसको सौंपी कश्ती, मैं भी सोचूं तू भी सोच
बढती चांदी, बढ़ता सोना, महंगा हो गया कोना कोना
फिर क्यूँ है जिंदगानी सस्ती, मैं भी सोचूं तू भी सोच
बाजारों में साधन सारे, मिल जाते है हाथ पसारे
कहाँ गई मन की वो मस्ती, मैं भी सोचूं तू भी सोच